+ केवलदर्शन, केवलज्ञान कहने का तात्पर्य -
चक्खुअचक्खुअवहिकेवलाण समयम्मि दंसणविअप्पा ।
परिपढिया केवलणाणदंसणा तेण ते अण्णा ॥20॥
अन्वयार्थ : [समयस्मि] आगम में [चक्खुअचक्खुअवहिकेवलाण] चक्षु, अचक्षु, अवधि, केवल (दर्शन) (ये) [दंसणवियप्पा] दर्शन के भेद प्रकट किए गए हैं (अतएव) [परिपढिया] पढ़े गए [तेण ते] उससे वे [केवलणाणदंसणा] केवलज्ञान और केवलदर्शन [अण्णा] अन्य (भिन्न) हैं ।
Meaning : In the sastra Darsana is divided into Caksu, Achaksu, Avadhi and Kevala. From this division we can say that Gyana and Darsana are different.

  विशेष 

विशेष :

आगम में सामान्‍य को ग्रहण करने वाले दर्शन के चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन इस प्रकार के चार भेद किये गए हैं । यद्यपि केवलदर्शन और केवलज्ञान में भेद नहीं है, किन्तु दर्शन के भेदों में केवलदर्शन पाठ आता है। दर्शन का ग्राह्य सामान्य धर्म है और ज्ञान का ग्राह्य विशेष धर्म है । इसलिए यह भेद ग्राह्य पदार्थ में है । उनको ग्रहण करने वाले उपयोग में दर्शन और ज्ञान का भेद रूप व्यवहार किया गया है । परन्तु यहाँ पर उपयोग के भेद की अपेक्षा से केवलदर्शन, केवलज्ञान आदि व्यवहार नहीं किया गया है, क्योंकि मूल में उपयोग तो एक ही है ।