
दंसणमोग्गहमेत्तं 'घडो' त्ति णिव्वण्णणा हवइ णाणं ।
जह एत्थ केवलाण वि विसेसणं एत्तियं चेव ॥21॥
दंसणपुव्वं णाणं णाणणिमित्तं तु दंसणं णत्थि ।
तेण सुविणिच्छियामो दंसणणाणाण अण्णत्तं ॥22॥
अन्वयार्थ : [जह] जैसे [ओग्गहमेत्तं] अवग्रह विकल्प ज्ञान मात्र [दंसणं] दर्शन है [घडो] घड़ा [त्ति] यह [णिव्वण्णणा] देखने से [णाणं] मतिज्ञान [हवइ] होता है [तह] वैसे [एत्थ] यहाँ [केवलणाण] केवलज्ञान [वि] भी [एत्तियं] इतनी ही [विसेसण] विशेषता [चेव] और भी है ।
[दंसणपुव्वं] दर्शन पूर्वक [णाणं] ज्ञान होता है [णाण णिमित्तं] ज्ञान के निमित्त पूर्वक [तु] तो [दंसण] दर्शन [णत्यि] नहीं है [तेण] इससे [सुविणिच्छियामो] भली-भाँति निश्चय करते हैं [दंसगणाणा] दर्शन और ज्ञान में [अण्णत्तं] अन्यत्व [ण] नहीं हैं ।
Meaning : Just as all Avagraha is Darsana and definite comprehension of a thing such as 'This is a jar' is knowledge, in the same manner, definite and indefinite apprehension is the differentiating factor between Absolute knowledge and Absolute perception.
Perception necessarily precedes knowledge but knowledge never precedes perception. It can, therefore, be definitely: asserted that, in a Kevalin, knowledge and perception are not different from each other.
विशेष
विशेष :
केवलदर्शन और केवलज्ञान में अभेद मानता हुआ भी जैन मतावलम्बी यह कहना चाहता है कि एक ही केवल उपयोग के ये भिन्न-भिन्न अंश हैं, अत: केवल नाम का भेद है। आगम में मतिज्ञान के अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये चार भेद कहे गए हैं। मूल में उपयोग रूप मति एक ही है । विषय और विषयी का सन्निपात होने पर प्रथम दर्शन होता है । उसके पश्चात् जो पदार्थ का ग्रहण होता है, वह अवग्रह कहलाता है । अवग्रह में पदार्थ का स्पष्ट बोध नहीं होता । किन्तु अवग्रह संशयात्मक नहीं है, निश्वयात्मक है। अवग्रह सामान्य को ग्रहण करने वाला दर्शन है । दर्शन तो सामान्य एवं वर्णन रहित है, किन्तु अवग्रह उससे विशिष्ट होने पर भी वर्णन रहित जैसा है। पश्चात् वर्णन या विकल्पपूर्वक पदार्थ का बोध होता है, जो मतिज्ञानोपयोग है।
यह तो अत्यन्त स्पप्ट है कि दर्शनपूर्वक ज्ञान होता है, ज्ञानपूर्वक दर्शन नहीं होता । इससे ही हम निश्चय करते हैं कि दर्शन और ज्ञान भिन्न-भिन्न हैं । किन्तु दर्शन और ज्ञान का यह भेद-व्यवहार अल्पज्ञ जीवों में होता है । सर्वज्ञ भगवान् में इनका भेद-व्यवहार नहीं है। उनके तो एक ही उपयोग होता है । उस केवल उपयोग के ये दो अंश हैं - एक अंश का नाम केवलदर्शन और दूसरे का नाम केवलज्ञान है ।
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