+ मतिज्ञान ही दर्शन -
जइ ओग्गहमेत्तं दंसणं ति मण्णसि विसेसिअं णाणं ।
मइणाणमेव दंसणमेवं सइ होइ निप्फण्णं ॥23॥
एवं सेसिंदियदंसणम्मि नियमेण होइ ण य जुत्तं ।
अह तत्थ णाणमेत्तं घेप्पइ चक्खुम्मि वि तहेव ॥24॥
अन्वयार्थ : [जइ] यदि [ओग्गह] अवग्रह (आद्य ग्रहण) [मेत्तं] मात्र [दंसणं] दर्शन है [ति] यह (तथा) [विसेसियं] विशेष (बोध) [णाणं] ज्ञान है [मण्णसि] मानते हो तो [एवं] इस प्रकार [सइ] होने पर (यह मतिज्ञान) [णिप्फण्णं] निष्पन्न (फलित) [होइ] होता है ।
[एवं] इस प्रकार होने पर [सेसिंदियदंसणम्मि] शेष इन्द्रियों के दर्शन में भी [णियमेण] नियम से यही मानना पड़ेगा, किन्तु [जुत्तं] युक्त [ण] नहीं [होइ] होता है [अह] और [तत्थ] वहाँ उन इन्द्रिय विषयक पदार्थों में [णाणमेत्तं] ज्ञान मात्र [घप्पई] ग्रहण किया जाता है तो [चक्खुम्मि] चक्षु इन्द्रिय के विषय में [वि] भी [तहेव] उसी प्रकार से ही मान लेना चाहिए ।
Meaning : If you say that all Avagraha is Darsana and comprehending the particulars of a thing is Gyana (knowledge) then it follows that Mati-Gyana alone is Darsana (perception).
The same must be said of all the rest of the senses as regards Darsana. But this is absurd. Now if in the case of objects of other senses, only knowledge is accepted the same must be accepted in the case of the objects of sight.

  विशेष 

विशेष :

यदि अवग्रह-मात्र दर्शन है और विशेष-बोध ज्ञान है, जैसा कि आप मानते हैं, तो इस मान्यता में मतिज्ञान ही दर्शन है, ऐसा इससे फलित होता है। जो यह कहता है कि मतिज्ञान के अवग्रह रूप अंश को दर्शन और ईहा अंश को ज्ञान कहते हैं, तो इस मान्यता से भी यही सिद्ध होता है कि मतिज्ञान ही दर्शन है । 'बृहद॒द्रव्यसंग्रह' में स्पर्शन-दर्शन, रसना-दर्शन, प्राण-दर्शन आदि का उल्लेख मिलता है। विशेष जानकारी के लिए अन्त में परिशिष्ट द्रष्टव्य है ।

यदि आप यह मानते हैं कि चक्षु-इन्द्रिय और मन को छोड़ कर शेष इन्द्रियजन्य अवग्रह ज्ञान रूप होता है और चक्षुजन्य अवग्रह दर्शन रूप होता है, तो यह कथन युक्तियुक्त नहीं है । क्योंकि अन्य इन्द्रियों से जिस प्रकार ज्ञान ही होता है; दर्शन नहीं, वैसे ही चक्षु इन्द्रिय के विषय में भी यह मान लेना चाहिए कि उससे भी अवग्रहादि रूप पदार्थों का ज्ञान होता है । इस प्रकार चक्षु-‌दर्शन की सिद्धि नहीं हो सकती ।