+ आगम में चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन क्यों? -
णाणं अप्पुट्ठे अविसए य अत्थम्मि दंसणं होइ ।
मोत्तूण लिंगओ जं अण्णागयाईयविसएसु ॥25॥
अन्वयार्थ : [अप्पुट्ठे] अस्पृष्ट में [अविसए] [य] और अविषय भूत [अत्थम्मि] पदार्थ में [दंसणं] दर्शन [होइ] होता है [अण्णागयाईयविसएसु] अनागत (भविष्य) आदि के विषयों (पदार्थों) में [लिंगओ] हेतु से जो ज्ञान होता है [जं] जिसे उसे [मोत्तृण] छोड़ कर दिया जाता है ।
Meaning : Darshana is that kind of knowledge which takes place as regards things untouched and which do not come within proper province. This cognition does not admit in its fold that knowledge which takes place by virtue of Hetu (the middle term) as regards things that are to happen in future and other things.

  विशेष 

विशेष :

आगम ग्रन्थों में जो चक्षुदर्शन और अचक्षुदर्शन शब्द मिलते हैं, उनका अभिष्राय यह है कि वे मतिज्ञान रूप हैं । चक्षु इन्द्रिय किसी भी विषयभूत पदार्थ से सन्निकृष्ट नहीं होती अर्थात्‌ आँख किसी भी वस्तु से जाकर भिड़ती नहीं है, फिर भी, दूरवर्ती चन्द्र, सूर्य आदि पदार्थों का बोध कराती है। यह बोध ही चक्षुदर्शन है । इसी प्रकार किसी भी इन्द्रिय के विषयभूत हुए बिना मानसिक चिन्तन से सूक्ष्म परमाणु आदि का जो ज्ञान होता है, उसे अचक्षुदर्शन कहा गया है। ये दोनों ही अपने साध्य के अविनाभावी हेतु से उत्पन्न होने के कारण अनुमान के अन्तर्गत ग्रहण नहीं किए गए है ।