
विशेष :
केवलज्ञान संख्यात रूप है, असंख्यात रूप है और अनन्त रूप भी है । उसी प्रकार राग-देष, मोह आदि जीव की पर्यायें भी संख्यात, असंख्यात और अनन्त रूप हैं । वस्तुतः मूल में आत्मा एक है, इसलिए उससे अभिन्न केवलज्ञान भी एक रूप है। दर्शन और ज्ञान की अपेक्षा केवल (कैवल्य) दो प्रकार का है । आत्मा उससे अभिन्न है और असंख्यात प्रदेश वाली है, इसलिए केवलज्ञान भी असंख्यात रूप है । केवलज्ञान अनन्त पदार्थों को जानता है । अनन्त पदार्थों को जानने के कारण केवलज्ञान अनन्त है। इसी प्रकार संसारी जीव रागी, द्वेषी, मोही है जो संख्यात, असंख्यात और अनन्तरूप है । इस प्रकार द्रव्य और पर्याय के कथंचित् भेद और कथंचित् अभेद का कथन किया गया है । |