
परपज्जवेहिं असरिसगमेहिं णियमेण णिञ्चमवि नत्थि ।
सरिसेहिं पि वंजणओ अस्थि ण पुणऽत्थपज्जाए ॥5॥
पच्चुप्पण्णम्मि वि पज्जयम्मि भयणागइं पडइ दव्वे ।
जं एगगुणाईया अणंतकप्पा गमविसेसा ॥6॥
अन्वयार्थ : [असरिसगमेहिं] असदृशी [परपज्जवेहिं] पर-पर्यायों की अपेक्षा से [णियमेण] नियम से [णिञ्चमवि] नित्य भी [णत्थि] नहीं है [सरिसेहिं पि] सदृशों में भी [वंजणओ] व्यंजन पर्यायों की अपेक्षा से [अत्थि] है [पुण] फिर [ण पुणऽत्थपज्जाए] अर्थपर्याय की अपेक्षा से नहीं है ।
[पच्चुप्पण्णम्मि वि] वर्तमान काल में भी [पज्जयम्मि] पर्याय में [दव्वे] द्रव्य [भयणागइं] भजनागति कथंचित् सत् और कथंचित् असत् को [पडइ] पड़ता है [जं एगगुणाईया] जिस एक गुण को आदि लेकर [गुणविसेसा] उस गुण के विशेष [अणंतकप्पा] अनन्त प्रकार होते हैं ।
Meaning : Every thing is non-existent from the standpoint of dissimilar particulars that are absolutely different from the thing. Even among things that are similar a thing exists from Vyanjana-paryaya point of view and does not exist from Arthaparyaya point of view.
Even as regards the present state a substance is both different and not different from it. For the degrees of qualities range from one to infinity.
विशेष