+ एक ही पुरुष में भेदाभेद -
कोवं उप्पायंतो पुरिसो जीवस्स कारओ होइ ।
तत्तो विभएयव्वो परम्मि सयमेव भइयव्वो ॥7॥
अन्वयार्थ : [कोवं] क्रोध को [उप्पायंतो] उत्पन्न करता हुआ [पुरिसो] पुरुष [जीवस्स] (उत्तरवर्ती) जीव का [कारओ होइ] कारक होता है [तत्तो] इससे वह [विभएयव्वो] भेद योग्य है और [परम्मि] पर भव में [सयमेव] स्वयं ही होने से [भइयव्वो] अभेद योग्य है ।
Meaning : A person, who on account of his passions in the present life, which becomes a cause of his future life is obviously different from person in the next birth, for cause and effect are different from each other. But on the other hand the person who exists at present will be the same person in his next birth. From this point of view, therefore, the person in his present as well as future life is identical.

  विशेष 

विशेष :

वर्तमान अवस्था को उत्पन्न करते वाला पुरुष जीव का कारक है । अपने आप में वह क्रोध को उत्पन्न करता है। इसलिए पहले के जीव से उसमें किसी अपेक्षा से भिन्‍नता है । वास्तव में जीव स्वयं पर्याय रूप परिणमन करता है । इसलिए संसारी जीव अपनी भविष्यत्‌ काल की पर्याय का निर्माता स्वयं है। अतएवं पूर्व पर्याय का जीव कारण है और उत्तरवर्ती पर्याय को श्राप्त जीव स्वयं कार्य है। वस्तुत: पूर्व पर्याय में रहने वाला जीव ही उत्तरवर्ती पर्याय वाला हुआ है । इस दृष्टि से इनमें कोई भेद नहीं है। इस प्रकार एक ही वस्तु में भेद-अभेद की सिद्धि कही गई है ।