
विशेष :
कई वैशेषिक आदि प्रवादीजनों का यह कथन है कि गुण गुणी से और गुणी गुण से सर्वथा भिन्न है । आत्मा ज्ञानवान् (गुणी) है - यह व्यवहार समवाय सम्बन्ध से होता है । लोक के पदार्थों का ज्ञान चक्षु इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष से स्पर्शन इन्द्रियजन्य होता है । जो वस्तु पहले देखी थी, उसको ही लेकर आ रहा हुँ - यह ज्ञान स्मरण के सहकारी प्रत्यभिज्ञान से होता है । इसलिए द्रव्य को ग्रहण करने वाला प्रमाण अन्य है और रूप, रस, गन्ध तथा स्पर्श को ग्रहण करने वाला प्रमाण अन्य है । इस प्रकार द्रव्य और गुणों को ग्रहण करने वाला प्रमाण अन्य होने से द्रव्य में तथा गुणों में भिन्तता निश्चित होती है । उनके अनुसार द्रव्य का लक्षण है : 'क्रियावत् गुणवत् समवायिकारणं द्रव्यम्' (क्रियावान् तथा गुणवान् समवायी कारण को द्रव्य कहते हैं) और 'द्रव्याश्रय्यागुणवान् संयोगविभागेष्वकारणमनपेक्ष:'- यह गुण का लक्षण है। इन लक्षणों की भिन्तता से भी गुण-गुणी एवं द्रव्य में भिन्नता है । यहाँ से भेदैकान्तवादी मान्यता का निरूपण किया जाता है । |