+ क्‍या द्रव्य और गुण में भेद है? -
रूव-रस-गंध-फासा असमाणग्गहण-लक्खणा जम्हा ।
तम्हा दव्वाणुगया गुण त्ति ते केइ इच्छंति ॥8॥
अन्वयार्थ : [जम्हा] जिस कारण [रूवरसगंधफासा] रूप, रस, गन्‍ध और स्पर्श ये [असमाणग्गहण] भिन्न प्रमाण से ग्रहण होते हैं और [लक्खणा] भिन्न लक्षण वाले हैं [तम्हा] इस कारण [ते] वे [दव्वाणुगया] द्रव्य के आश्रित [गुण] गुण हैं [त्ति] ] ऐसा [कइ] कई (प्रवादी जन) [इच्छंति] मानते हैं ।
Meaning : Some people think that attributes or qualities of a substance are different from the substance and depend upon the subs. tance because these attributes of colour, smell, touch, taste are comprehended by means other than those by which a substance is different from those of its attributes.

  विशेष 

विशेष :

कई वैशेषिक आदि प्रवादीजनों का यह कथन है कि गुण गुणी से और गुणी गुण से सर्वथा भिन्‍न है । आत्मा ज्ञानवान्‌ (गुणी) है - यह व्यवहार समवाय सम्बन्ध से होता है । लोक के पदार्थों का ज्ञान चक्षु इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष से स्पर्शन इन्द्रियजन्य होता है । जो वस्तु पहले देखी थी, उसको ही लेकर आ रहा हुँ - यह ज्ञान स्मरण के सहकारी प्रत्यभिज्ञान से होता है । इसलिए द्रव्य को ग्रहण करने वाला प्रमाण अन्य है और रूप, रस, गन्ध तथा स्पर्श को ग्रहण करने वाला प्रमाण अन्य है । इस प्रकार द्रव्य और गुणों को ग्रहण करने वाला प्रमाण अन्य होने से द्रव्य में तथा गुणों में भिन्‍तता निश्चित होती है । उनके अनुसार द्रव्य का लक्षण है : 'क्रियावत्‌ गुणवत्‌ समवायिकारणं द्रव्यम्‌' (क्रियावान्‌ तथा गुणवान्‌ समवायी कारण को द्रव्य कहते हैं) और 'द्रव्याश्रय्यागुणवान्‌ संयोगविभागेष्वकारणमनपेक्ष:'- यह गुण का लक्षण है। इन लक्षणों की भिन्‍तता से भी गुण-गुणी एवं द्रव्य में भिन्‍नता है । यहाँ से भेदैकान्तवादी मान्यता का निरूपण किया जाता है ।