+ सिद्धान्ती का तर्क -
जुज्जइ संबंधवसा संबंधिविसेसणं ण उण एयं ।
णयणाइविसेसगओ रूवाइविसेसपरिणामो ॥२१॥
अन्वयार्थ : [संबंधवसा] सम्बन्ध वश से [संबंधिविसेसणं] सम्बन्ध विशेष (वाली वस्तु) [ण] नहीं [जुज्जइ] प्रयुक्त होती है [उण] फिर [एयं] यह (ये) [णयणाइविसेसगओ] नेत्र आदि के विशेष सम्बन्ध (के कारण) [रूवाइ विसेसपरिणामो] रूप आदि विशेष परिणाम घटित होते हैं ।
Meaning :  True that peculiar relation proceeds from peculiar relationship, but colour, smell and other transformations spring from the relation of the senses (with things) and so in this particular case the proposition stated above (as regards the peculiar relation) does not hold good.

  विशेष 

विशेष :

अभेदवादी के इस कथन से सम्बन्धों के वश से वस्तु में अनेक प्रकार का सम्बन्धीपन सिद्ध होता है । हमारी असहमति नहीं है (जैसे कि) एक ही पुरुष दण्ड के सम्बन्ध से दण्डी कहा जाता है और कम्बल के सम्बन्ध से उसे ही कम्बली कहा जाता है। किन्तु हमारा यह प्रश्न आप से बराबर बना हुआ है कि भिन्‍न-भिन्‍न कालेपन में वैषम्य प्रतीत होता है, वह चक्षु इन्द्रिय से किस प्रकार ग्राह्य हो सकता है ? क्योंकि चक्ष्‌ इन्द्रिय का सम्बन्ध केवल कृष्ण वर्ण से है, उसकी विषमता से नहीं है । विषमता का सम्बन्ध तो विशेष धर्म से है जो वस्तु में स्वतः सिद्ध है, निमित्त कारण उसके व्यंजक मात्र होते हैं ।