
विशेष :
उत्पाद, व्यप और ध्रौव्य इन तीनों का किसी अपेक्षा एक काल कहा गया है, किसी अपेक्षा अनेक भी कहा गया है । 'एक काल का अभिप्राय यह है कि ये भिन्न-भिन्न समय में नहीं होते । इनके उत्पन्न होते का जो समय है, वही व्यय होने का है और वही धौव्य का समय है। और 'अनेक काल' का तात्पर्य यह है कि उत्पाद का काल भिन्न है, व्यय का काल भिन्न है और ध्रौव्य का काल भिन्न है । यद्यपि सामान्य रूप से वस्तु प्रत्येक समय मे पूर्व जैसी ही प्रतीत होती है । किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रथम समय में दूसरे समय की स्थिति भिन्न है और दूसरे समय से तृतीय, चतुर्थ आदि समय की स्थिति भिन्न-भिन्न है । यदि ऐसा न माना जाए तो वस्तु का कभी विनाश नहीं हो सकेगा । जो यह कहा गया है कि वस्तु की उत्पत्ति, नाश एवं स्थिति का किसी अपेक्षा से एक समय है । इसी को ध्यान मे रख कर कोई तर्क करता है कि अंगुली के संकुचित करने का जो समय है, वही उसके फैलाने का भी समय है । यह मान्यता युक्तियुक्त नहीं है । दृष्टान्त के द्वारा समझाते हुए कहते हैं कि जो अंगुली पहले सीधी थी, वह अब टेढ़ी हो गयी हैं। इसका अर्थ यह है कि सीधापन मिट कर टेढ़ापन आ गया है । इसमें सीधेपन का विनाश भिन्न है और टेढ़ेपन का उत्पाद भिन्न है । इस प्रकार इनमें यहाँ पर समय-भेद देखा जा सकता है । सिद्धान्त के प्रतिपादक आचार्य ने इस समय-भेद की स्थापना की है । द्रव्य के उत्पन्न होने के समय में ऐसा कहना कि यह उत्पन्न हो चुका है, यह नष्ट हो रहा है, यह नष्ट हो चुका है - इस प्रकार त्रैकालिक उत्पाद और व्यय को लेकर जो द्रव्य की प्ररूपणा करता है, वह द्रव्य को त्रिकालवर्ती विशेषित करता है । द्रव्य किसी पर्याय की अपेक्षा नष्ट होता है, किसी पर्याय की अपेक्षा उत्पन्न होता है और किसी अपेक्षा वह स्थिर भी रहता है । उत्पत्ति, नाश एवं स्थिति का यह सम्बन्ध वर्तमान काल से है । इसी प्रकार द्रव्य किसी पर्याय की अपेक्षा नष्ट हुआ, उत्पन्न हुआ और स्थिर भी रहा-यह भूतकाल की अपेक्षा से है । इसी प्रकार भविष्ययत् काल की अपेक्षा से द्रव्य उत्पन्न होगा, नष्ट होगा और स्थिर बना रहेगा। इस प्रकार ये तीनों कालत्नय की अपेक्षा से द्रष्य में घटित होते हैं । |