+ धर्मवाद -
दुविहो धम्मावाओ अहेउवाओ य हेउवाओ य ।
तत्थ उ अहेउवाओ भवियाऽभवियादओ भावा ॥43॥
भविओ सम्मद्दंसण-णाण-चरित्तपडिवत्तिसंपन्नो ।
णियमा दुक्खंतकडो त्ति लक्खणं हेउवायस्स ॥44॥
जो हेउवायपक्खम्मि हेउओ आगमे य आगमिओ ।
सो ससमयपण्णवओ सिद्धंतविराहओ अन्नो ॥45॥
अन्वयार्थ : [धम्मावाओ] धर्मवाद [दुविहो] दो प्रकार का है [अहेउवाओ] अहेतुवाद [य] और [हेउवाओ] हेतुवाद [य] और [तत्थ] उसमें [अहेउवाओ] हेतुवाद (के विषय ) [उ] तो [भवियाऽभवियादओ] भव्य-अभव्य (धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय) आदि [भावा] पदार्थ हैं ।
[सम्मद्दंसणणाणचरित्त] सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्‌ चारित्र की [पडिवत्ति संपन्नो] प्राप्ति से युक्त (जीव) [भविओ] भव्य है [णियमा] नियम से वह [दुक्खंतकडो] दु:खों का अन्त करने वाला होगा [त्ति] यह [हेउवायस्स] हेतुवाद का [लक्खणं] लक्षण है ।
जो जो (पुरुष) [हेउवायपक्खम्मि] हेतुवाद के पक्ष में [हेउओ] हेतु का [आगमे य] और आगम में [आगमिओ] आगम का प्रयोग करता है [सो] वह [ससमयपण्णवओ] स्व समय का प्ररूपक है [अण्णो] अन्य (इससे भिन्न) [सिद्धंतविराहओ] सिद्धान्त विराधक है ।
Meaning : Agama (canon or canonical Literature) which propounds Religion, consists of Hetuvada (Rational portion) and Ahetuvada (dogmatic portion). Padarthas (categories) such as Bhavya and Abhavya etc. are the proper subjects for Ahetavada.
Bhavya according to Hetuvada removes or destroys all unhappiness through Right vision, Right knowledge and Right conduct.
He only is Aradhaka (propagator of right religion) who takes recourse to Hetu only when Hetuvada is to be discussed and relies on Agama when Agamavada is under discussion. One, who does not do this, is Viradhaka (heretic).

  विशेष 

विशेष :

धर्मवाद (वस्तु में अनन्त धर्म हैं, यह निर्दोष रीति से प्रतिपादन करने वाला आगम) दो प्रकार का है -- एक हेतुवाद दूसरा अहेतुवाद । आगम में प्रतिपादित तत्त्वों की प्ररूपणा इन दो भागों में विभक्त है । केवल आज्ञाप्रधानी या श्रद्धाप्रधानी अथवा परीक्षाप्रधानी हेतुवाद होना श्रेयस्कर नहीं है । क्‍योंकि जहाँ तक हेतुवाद से लाभ हो सकता है, वहाँ तक परीक्षाप्रधानी बन कर अवश्य लाभ लेना चाहिए । परन्तु जहां हेतुवाद की आवश्यकता न हो, अवकाश न हो, वहाँ आज्ञाप्रघानी बन कर उस तत्त्व को स्वीकार करना चाहिए । इस प्रकार दोनों दृष्टियों से वस्तु-तत्त्व का रहस्य समझा जा सकता है; एकदृष्टि मात्र से नहीं । आगम में इसीलिए दोनों नयों (दृष्टियों) की प्ररूपणा की गई है ।

जिस जीव को सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र प्राप्त होने वाले है, वह भव्य जीव कहा गया है। जिसे सम्यक्त्व प्राप्त नहीं होता, वह अभव्य है। इस प्रकार आगम में प्ररूपित तत्त्व को जान कर जो प्राणी किसी जीव में व्यक्त सम्यग्दर्शनादि भव्य लक्षण को देखता है तो वह अनुमान से जान लेता है कि यह भव्य तथा अल्प-संसारी है । इस प्रकार से उसका यह जानना हेतुवाद पूर्वक होने से हेतुवाद स्वरूप है। इसी प्रकार चैतन्य से रहित वस्तु को अजीव जानना भी हेतुवाद है, क्योंकि यह अनुमान से जाना जाता है। जो तत्त्व केवल आमम में कहा गया है, जिसमें हेतुवाद नहीं चल सकता है; जैसे कि जीव के असंख्यात प्रदेश होते है - यह कथन अहेतुवाद का विषय है । जीव के भव्य, अभव्य भेद क्‍यों किए गए ? इस सम्बन्ध में चिन्तन करने के लिए हेतुवाद को अवकाश नही है ।

सर्वज्ञ की सत्ता स्थापित करना, मुक्ति को उपलब्ध जीव का संसार में लौट कर पुनः न आना इत्यादि कथन सुनिश्चित व असंभव-बाधक रूप हेतु होने से हेतुवाद का ही विषय है । जो विषय हेतुवाद का है, उसे हेतुवाद से जानने वाला ही स्वसमय का प्ररूपक कहा गया है । इसी प्रकार जो विषय आगमवाद का है, उसे भी श्रद्धापूर्वक आगम से जानने वाला स्वसमय-प्ररूपक है । किन्तु जो आगमवाद में हेतुवाद का और हेतुवाद मे आगमवाद का प्रतिपादन करता है वह व्यक्ति अनेकान्त सिद्धांत की विराधना करने वाला है।