
परिसुद्धो नयवाओ आगममेत्तत्थसाहओ होइ ।
सो चेव दुण्णिगिण्णो दोण्णि वि पक्खे विधम्मेइ ॥46॥
जावइया वयणवहा तावइया चेव होंति णयवाया ।
जावइया णयवाया तावइया चेव परसमया ॥47॥
जं काविलं दरिसणं एवं दव्वट्ठियस्स वत्तव्वं ।
सुद्धोअणतणअस्स उ परिसुद्धो पज्जवविअप्पो ॥48॥
दोहि वि णएहि णीअं सत्थमुलूएण तह वि मिच्छत्तं ।
जं सविसअप्पहाणतणेण अण्णोण्णणिरवेक्खा ॥49॥
अन्वयार्थ : [आगममेत्तत्थसाहओ] आगम मात्र अर्थ का साधक [परिसुद्धो] परिशुद्ध [णयवाओ] नयवाद [होइ] होता है [सो] वह [चेव] ही और [दुण्णिगिण्णो] दुर्निक्षिप्त [दोण्णि वि] दोनों ही [पक्खे] पक्ष में [विधम्मेइ] विनाशक होता है ।
[जावइया] जितने भी [वयणवहा] वचन] पथ [तावइया] उतने [चेव] ही [णयवाया] नयवाद [होंति] होते है [जावइया] जितने [णयवाया] नयवाद हैं [तावइया] उतने [चेव] ही [परसमया] अन्य मत ।
[जं] जो [काविलं दरिसणं] सांख्य दर्शन है वह [एयं] यह [दव्वट्ठियस्स] द्रवयार्थिक नय का [वत्तव्वं] वक्तव्य है [सुद्धोअणतणअस्स उ] किन्तु गौतम बुद्ध का [परिसुद्धो] विल्कुल शुद्ध [पज्जवविअप्पो] पर्यायार्थिक नय का विकल्प है ।
[दोहि वि] दोनों ही [णयेहि] नयों से [उलुएण] कणाद ने [सत्थम्] शास्त्र [णीयं] रचना की [तह वि] तो भी [मिच्छत्तं] मिथ्यात्व है [जं] जो [सविसअप्पहाणतणेण] अपने विषय प्रधानता से [अण्णोण्णणिरवेक्खा] परस्पर निरपेक्ष हैं ।
Meaning : The only subject of pure Naya-vada is the exposition of the Canon. If it is not rightly applied, it spoils both purposes.
Naya-vada are as many in number as there are methods of putting the sentences. Para-samayas also are so many as Naya-vadas.
Philosophy taught and promulgated by Kapila is nothing but a representation of Dravyastika-naya and that which is taught by Buddha--the son of Suddhodana is an exposition of Paryayastika Naya pure and simple.
Although the philosophical exposition is made by Kanada with reference to both the Nayas but it is full of fallacies because both the Nayas are made use of independently.
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