
विशेष :
बौद्ध और वेशेषिक सांख्यों के सद्वाद पक्ष में जो दोष बताते है, वे सब सत्य हैं । इसी प्रकार-सांख्य लोग बौद्ध तथा वैशेषिक के असद्वाद में जो दोष लगाते हैं, वे भी सच्चे हैं । सांख्य सत्कार्यवादी है । उसकी दृष्टि में घट पर्याय कोई नवीन उत्पन्न नहीं होती । वह तो स्वयं कारण रूप मिट्टी में पहले से ही छिपी हुई है, निमित्त कारण पा कर प्रकट हो जाती है । परन्तु असत् कार्य वादी बौद्ध तथा वैशेषिक ऐसा कहते हैं कि आप की मान्यता सम्यक् मानी जाए, तो कार्य को प्रकट करने के लिए कारण की आवश्यकता क्या है ? क्योंकि कार्य तो अपने कारण मे विद्यमान है । यदि यह कहा जाए कि कारण से उसका आविर्भाव होता है तो सत्कार्यवाद समाप्त हो जाता है; क्योंकि उत्पत्ति का दूसरा नाम ही आविर्भाव है । मिट्टी में घड़े की अवस्था छिपी हुई थी। निमित्त कारण से वह अवस्था प्रकट हो जाती है। इसी अवस्था का नाम उत्पत्ति है । जब वे दोनों वाद (सद्वाद तथा असद्वाद) अनेकान्त दृष्टि से युक्त होते हैं, तभी सर्वोत्तम सम्यग्दर्शन बनते है । क्योंकि एक-दूसरे की मान्यता से रहित सर्वथा स्वतन्त्र रूप में रहने पर वे संसार के दुःखों से जीव को मुक्ति नहीं दिला सकते । बौद्ध और वैशेषिकों के प्रति सांख्य का यह कथन है कि यदि अपूर्व ही घटादि कार्य उत्पन्त होते हैं, तो मनुष्य के मस्तक पर सींग भी होने चाहिए । फिर यह नियम नहीं बन सकता कि मिट्टी से ही घडा बनता है, सूत में ही वस्त्र बनता है । इस प्रकार चाहे जिस पदार्थ से चाहे जिस कार्य की उत्पत्ति हो जानी चाहिए । किन्तु लोक में ऐसा होता नहीं है; आम के पेड़ से ही आम के फल मिलते है । अत: इन परस्पर निरपेक्ष दृष्टियों पर जो दोषारोपण किए जाते हैं, वे सर्वथा सत्य ही हैं । घड़ा पृथ्वी से भिन्न नहीं है, इसलिए उससे अभिन्न है तथा घड़ा पृथ्वी में पहले नहीं था, इसलिए वह उससे भिन्न है। यह निश्चित है कि मिट्टी में घड़े रूप होने की योग्यता, शक्ति है । किन्तु केवल मिट्टी की दशा में वह घड़ा नहीं है । विभिन्न सहकारी कारणों से युक्त होकर मिट्टी स्वयं घड़े रूप परिणमती है । अतएव घड़ा मिट्टी से अभिन्न भी है और भिन्न भी है । विभिन्न कारण-कलापों के योग से मिट्टी का घड़ा बनता है जो प्रत्यक्ष रूप से भिन्न दिखलाई पड़ता है । किन्तु वास्तव में मिट्टी का विशिष्ट परिणमन ही घड़े के आकार का निर्माण है । मूल द्रव्य का कोई निर्माणकर्ता नही है । प्रत्येक द्रव्य का परिणमन भी स्वतन्त्र है । इसलिए मिट्टी में जो भी परिणमन होता है, वह अपनी योग्यता से होता है । परमार्थ में उसे कोई परिणमाने वाला नहीं है । |