+ वे सभी सदोष -
 जे संतवायदोसे सक्कोलूया भणंति संखाणं ।
संखा य असव्वाए तेसिं सव्वे वि ते सच्चा ॥50॥
ते उ भयणोवणीया सम्मद्दंसणमणुत्तरं होंति ।
जं भवदुक्खविमोक्खं दो वि न पूरेंति पाडिक्कं ॥51॥
नत्थि पुढविविसिट्टो 'घडो' त्ति जं तेण जुज्जइ अणण्णो ।
जं पुण 'घडो' त्ति पुव्वं ण आसि पुढवी तओ अण्णो ॥52॥
अन्वयार्थ : [सक्कोलूया] बौद्ध एवं वैशेषिक [जे] जिन [संतवायदोसे] सत्‌ (कार्य) वादी दोषों को [संखाणं] सांख्य के (सिद्धान्त पर) [भणंति] कहते हैं [तेसिं] उनके [य] और [संखा] सांख्य [असव्वाए] असद्वाद (पक्ष) में (दोष प्रकट करते हैं) [ते] वे [सव्वे वि] सभी (दोष) [सच्चा] सच्चे हैं ।
[ते] वे दोनों (सत्‌वाद, असत्‌वाद) [भयणोवणीया] विभाग (किए जाने पर) [अणुत्तरं] सर्वोत्तम [सम्मद्दंसणम्] सम्यग्दर्शन [होंति] होते हैं [जं] जो (वह) [पाडिक्कं] प्रत्येक [दो वि] दोनों ही [भवदुक्खविमोक्खं] संसार के दुःख से मुक्ति [ण पूरेंति] दिला सकते हैं ।
[घडो त्ति] यह घड़ा [पुढवीविसिट्ठो] पृथ्वी से विशिष्ट (भिन्न) [णत्थि] नहीं है [जं] जो [तेण] उससे [अणण्णो] अभिन्‍न [जुज्जइ] युक्त होता है [जं पुण] जो पुन: [त्ति] यह (पृथ्वी) [पुव्वं घड़ो ण] पहले घड़ा नहीं [आसि] थी [तओ] इसलिए [पुढवी] पृथ्वी से [अण्णो] भिन्न है ।
Meaning : Faults and Fallacies which are there according to Bauddhas and Vaisesikas in the Sadwada (theory of evolution) of Sankhya are all true and those of Asadvada Paksa. (theory of creation) of which the Bauddhas and Vaisesikas are accused hold also true.
When this Sadvada and Asadvada are adjusted according to Anekanta the result is Samyag-Darsana (Right vision), because they both are not severally able to liberate a man from the world.
The same reason, which proves the Jar not a separate entity from the earth, accounts for the fact that it is same as earth. And because the earth was not a pot before, it is also separate from it.

  विशेष 

विशेष :

बौद्ध और वेशेषिक सांख्यों के सद्वाद पक्ष में जो दोष बताते है, वे सब सत्य हैं । इसी प्रकार-सांख्य लोग बौद्ध तथा वैशेषिक के असद्वाद में जो दोष लगाते हैं, वे भी सच्चे हैं । सांख्य सत्कार्यवादी है । उसकी दृष्टि में घट पर्याय कोई नवीन उत्पन्न नहीं होती । वह तो स्वयं कारण रूप मिट्टी में पहले से ही छिपी हुई है, निमित्त कारण पा कर प्रकट हो जाती है । परन्तु असत्‌ कार्य वादी बौद्ध तथा वैशेषिक ऐसा कहते हैं कि आप की मान्यता सम्यक्‌ मानी जाए, तो कार्य को प्रकट करने के लिए कारण की आवश्यकता क्या है ? क्‍योंकि कार्य तो अपने कारण मे विद्यमान है । यदि यह कहा जाए कि कारण से उसका आविर्भाव होता है तो सत्कार्यवाद समाप्त हो जाता है; क्योंकि उत्पत्ति का दूसरा नाम ही आविर्भाव है । मिट्टी में घड़े की अवस्था छिपी हुई थी। निमित्त कारण से वह अवस्था प्रकट हो जाती है। इसी अवस्था का नाम उत्पत्ति है ।

जब वे दोनों वाद (सद्वाद तथा असद्वाद) अनेकान्त दृष्टि से युक्त होते हैं, तभी सर्वोत्तम सम्यग्दर्शन बनते है । क्योंकि एक-दूसरे की मान्यता से रहित सर्वथा स्वतन्त्र रूप में रहने पर वे संसार के दुःखों से जीव को मुक्ति नहीं दिला सकते । बौद्ध और वैशेषिकों के प्रति सांख्य का यह कथन है कि यदि अपूर्व ही घटादि कार्य उत्पन्त होते हैं, तो मनुष्य के मस्तक पर सींग भी होने चाहिए । फिर यह नियम नहीं बन सकता कि मिट्टी से ही घडा बनता है, सूत में ही वस्त्र बनता है । इस प्रकार चाहे जिस पदार्थ से चाहे जिस कार्य की उत्पत्ति हो जानी चाहिए । किन्तु लोक में ऐसा होता नहीं है; आम के पेड़ से ही आम के फल मिलते है । अत: इन परस्पर निरपेक्ष दृष्टियों पर जो दोषारोपण किए जाते हैं, वे सर्वथा सत्य ही हैं ।

घड़ा पृथ्वी से भिन्‍न नहीं है, इसलिए उससे अभिन्‍न है तथा घड़ा पृथ्वी में पहले नहीं था, इसलिए वह उससे भिन्‍न है। यह निश्चित है कि मिट्टी में घड़े रूप होने की योग्यता, शक्ति है । किन्तु केवल मिट्टी की दशा में वह घड़ा नहीं है । विभिन्न सहकारी कारणों से युक्त होकर मिट्टी स्वयं घड़े रूप परिणमती है । अतएव घड़ा मिट्टी से अभिन्‍न भी है और भिन्‍न भी है । विभिन्‍न कारण-कलापों के योग से मिट्टी का घड़ा बनता है जो प्रत्यक्ष रूप से भिन्‍न दिखलाई पड़ता है । किन्तु वास्तव में मिट्टी का विशिष्ट परिणमन ही घड़े के आकार का निर्माण है । मूल द्रव्य का कोई निर्माणकर्ता नही है । प्रत्येक द्रव्य का परिणमन भी स्वतन्त्र है । इसलिए मिट्टी में जो भी परिणमन होता है, वह अपनी योग्यता से होता है । परमार्थ में उसे कोई परिणमाने वाला नहीं है ।