+ कार्य की उत्पत्ति स्व-कारण से -
कालो सहाव णियई पुव्वकयं पुरिसकारणेगंता ।
मिच्छत्तं ते चेवा (व) समासओ होंति सम्मत्तं ॥53॥
अन्वयार्थ : [कालो] काल [सहाव] स्वभाव [णियई] नियत्ति [पुव्वकयं] पूर्वकृत (अदृष्ट) [पुरिस] पुरुष (रूप) [कारणेगंता] कारण (विषयक) एकान्त (वाद) [मिच्छत्त] मिथ्यात्व हैं [ते चेव] वे ही [समासओ] समस्त (समग्र रूप में, सापक्ष रूप से मिलने पर) [सम्मत्तं] सम्यक् [होंति] होते है ।
Meaning : Kala (Time), Svabhava (Nature), Niyati (Destiny), Purvakrta Adrsta (Unknown actions of the past) and Purusartha (Effort)all these five taken singly are false because they touch only one point. They all are true if they are made use of with reference to each other.

  विशेष 

विशेष :

प्रत्येक कार्य अपने कारण से उत्पन्न होता है, यह एक शाश्वत नियम है । क्‍योंकि लोक में जो भी कार्य उत्पन्न हुए देखे जाते हैं, उनमे कोई-न-कोई कारण-सम्बन्ध लक्षित होता है। इन कारणों के सम्बन्ध में ही यहाँ पर विचार किया गया है । कोई काल को कारण मानता है, तो कोई स्वभाव को । यही नही, कोई नियति को कारण मानता है और अदृष्ट को । कोई इन चारों को कारण न मान कर केवल पुरुषार्थ को ही कारण मानता है। इस प्रकार कारण के सम्बन्ध में विभिन्‍न मत हैं । एक कारणवादी दूसरे कारणवादी की मान्यता का तिरस्कार करता है। अतएव सभी एकान्त रूप से अपनी-अपनी मान्यता को अंगीकार किए हुए हैं । ये सभी विचार अपने आप में अपूर्ण हैं । इनमें किसी प्रकार की समन्वय दृष्टि नहीं है। इसलिए ये सम्यक नहीं हो सकते हैं ।