+ अनेकान्त-दृष्टि के अभाव में -
साहम्मउ व्व अत्थं साहेज्ज परो विहम्मओ वा वि ।
अण्णोणं पडिकुट्ठा दोण्णवि एए असव्वाया ॥56॥
दव्वट्ठियवत्तव्वं सामण्णं पज्जवस्स य विसेसो ।
एए समोवणीआ विभज्जवायं विसेसेंति ॥57॥
हेउविसओवणीअं जह वयणिज्जं परो नियत्तेइ ।
जइ तं तहा पुरिल्लो दाइंतो केण जिव्वंतो ॥58॥
एयंताऽसब्भूयं सब्भूयमणिच्छियं च वयमांणो ।
लोइय-परिच्छियाणं वयणिज्जपहं पडइ वादी ॥59॥
अन्वयार्थ : [परो] पर (एकान्तवादी) [साहम्मऊ] साधम्य से [व्व] अथवा [विहम्मओ] वैधर्म्य से [वा वि] भी [अत्थ] अर्थ (साध्य) [साहेज्ज] साधे [एए] ये [दोण्णि वि] दोनों ही [अण्णोण्णं] परस्पर [पडिकुट्ठा] प्रतिषिद्ध (प्रतिकूल) [असव्वाया] असद्वाद हैं ।
[दव्वट्ठियवत्तव्वं] द्रव्यार्थिक (नय) का वक्तव्य [सामण्णं] सामान्य (है) य] और [पज्जवस्स] पर्यायाथिक (नय) का (वक्तव्य) [विसेसो] विशेष है [समोवणीया] प्रस्तुत [एए] ये दोनों (सापेक्ष रूप से) [विभज्जवायं] अनेकान्तवाद को [विसेसेंति] विशिष्ट बनाते हैं (रचते हैं )
[हेउविसओवणीयं] हेतु (के) विषय (रूप में) प्रस्तुत [वयणिज्जं] वचन योग्य (विषय को) [जह] जिस प्रकार [परो] प्रतिवादी [णियत्तेइ] निवारण करता है [जइ] यदि [पुरिल्लो] पूर्ववर्ती (वादी नें) [तं] उस (साध्य) को [तहा] उसी प्रकार (हेतुपूर्वक) [दाइंतो] दिखलाए तो [केण] किसके द्वारा [जिव्वंतो] जीता (जा सकता है) ?
[एयंताऽसब्भूयं] एकान्त असद्भूत का (अथवा) [सब्भूयमणिच्छियं] सद्भूत (होने पर भी) अनिश्चित [वयमाणो] बोलने वाला [वादी] वादी [लोइयपरिच्छियाणं] लौकिक (तथा) परीक्षकों के [वयणिज्जपहं] वचन पथ को [पडइ] प्राप्त होता है (निन्‍दा का पात्र बन जाता है)
Meaning : When Ekantavadi (Radicalist) establishes a conclusion by Sadharmya (Similari. ty; analogy) or Vaidharmya (dissimilarity), they both result in an Asadvada.
Noumenal view-point is concerned with Samanya (general) and Phenomenal view-point with Visesa (particular). When they are employed independently, they give rise to Radical view-point.
The opponent disproves the Sadhya (major term) which is going to be proved by Hetu (Middle term) because it has been put in an objectionable way. Who would have conquered the Vadi who has employed the major term as it ought to be employed ?
Vadi who speaks utter falsehood or who makes an indefinite statement even though it may be true, is accused by the examiners.

  विशेष 

विशेष :

अनेकान्त-दृष्टि को विस्मृत कर कोई वादी साधर्म्य दृष्टि से या वैधर्म्य दृष्टि से अपने साध्य रूप अर्थ को सिद्ध करता है, तो दोनों दृष्टियाँ परस्पर प्रतिकूल होती हैं तथा दोनों वाद असद्वाद कहे जाते हैं। यदि ये दोनों मान्यताएँ अनेकान्त शासन की मुद्रा से मुद्रित हों, तो उनमें परस्पर सौहादई होने से कोई खण्डित नहीं कर सकता है । इसलिए किसी एक ही वस्तु मे नित्यता और अनित्यता सिद्ध करने के लिये केवल साधर्म्य दृष्टान्त या वैधर्म्य दृष्टान्त का प्रयोग करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनमें समन्वय होना भी आवश्यक है। क्योंकि समन्वय के अभाव में ये दोनों ही परस्पर विरोधी हैं तथा अपूर्ण हैं। इनमें समत्वय न होने से ये एक-दूसरे को मान्य नहीं हो सकते । परिणामस्वरूप इनका आपसी विरोध कभी शान्त नहीं हो सकता । अतएव ग्रंथकार ने परस्पर विरुद्ध दोनों मान्यताओं को 'असद्वाद' कहा है ।

द्रव्यार्थिक नय की मान्यता से सामान्य ही वास्तविक है तथा पर्यायार्थिक नय की मात्यता से केवल विशेष ही वास्तविक है। परन्तु इन दोनों के सापेक्ष होने पर एक-दूसरे का अस्तित्व सम्भावित हो जाता है । अतएव जब सामान्य धर्म की विवेचना की जाती है तो विशेष धर्म अविवक्षित होने से गौण हो जाता है । इसी प्रकार जब विशेष धर्म की प्ररूपणा होती है तो सामान्य धर्म गौण हो जाता है । इनमें जो परस्पर मुख्य, गौण दृष्टि अन्वित रहती है, वही अनेकान्त की आधार-शिला है। इस प्रकार इन दोनों नय के सापेक्ष होने पर अनेकान्तवाद का जन्म होता है ।

यदि वादी पहले से ही अनेकान्त-दृष्टि को रख कर हेतु पूर्वक साध्य का उपन्यास करता है, तो प्रतिवादी में ऐसी शक्ति नहीं है जो उसे पराजित कर सके । दूसरे शब्दों में प्रयोग-काल में साध्य के अविनाभावी हेतु के प्रयोग से साध्य को सिद्धि करने वाले वादी को कोई जीत नहीं सकता है। क्‍योंकि उसके वचन अनेकान्त रूपी कवच से ही सुरक्षित होते हैं। फिर, साध्य वादी को ही इष्ट होता है, प्रतिवादी को नहीं ।

वादी अपने अभिलषित साध्य को सिद्धि हेतु जिस साधन का प्रयोग करता है, उसका अपने साध्य के साथ अविनाभाव सम्बन्ध है या नहीं - यह प्रकट करने लिए वह साधर्म्य या वैधर्म्य दृष्टान्त का प्रयोग करें या न करे; किन्तु यदि उसका पक्ष अनेकान्त सिद्धान्त की मान्यता के अनुरूप है तो किसी भी अवस्था में उसका खण्डन नहीं हो सकता । एकान्त मान्यता वाला पक्ष तो पूर्ण रूप से कभी निर्दोष सिद्ध नहीं ही सकता। इससे यह स्पष्ट है कि एकान्त मान्यता ही आक्षेप का विषय है। क्योंकि एकान्तवादी परस्पर विरोधी होने के कारण एक-दूसरे को नहीं मानते, जिससे विरोध तथा विग्रह उत्पन्न होता है । किंतु अनेकान्त की मान्यता से परस्पर सौहार्द एवं सौमनस्य होता है तथा समन्वय की भूमिका का निर्माण होता है ।