
विशेष :
अनेकान्त-दृष्टि को विस्मृत कर कोई वादी साधर्म्य दृष्टि से या वैधर्म्य दृष्टि से अपने साध्य रूप अर्थ को सिद्ध करता है, तो दोनों दृष्टियाँ परस्पर प्रतिकूल होती हैं तथा दोनों वाद असद्वाद कहे जाते हैं। यदि ये दोनों मान्यताएँ अनेकान्त शासन की मुद्रा से मुद्रित हों, तो उनमें परस्पर सौहादई होने से कोई खण्डित नहीं कर सकता है । इसलिए किसी एक ही वस्तु मे नित्यता और अनित्यता सिद्ध करने के लिये केवल साधर्म्य दृष्टान्त या वैधर्म्य दृष्टान्त का प्रयोग करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनमें समन्वय होना भी आवश्यक है। क्योंकि समन्वय के अभाव में ये दोनों ही परस्पर विरोधी हैं तथा अपूर्ण हैं। इनमें समत्वय न होने से ये एक-दूसरे को मान्य नहीं हो सकते । परिणामस्वरूप इनका आपसी विरोध कभी शान्त नहीं हो सकता । अतएव ग्रंथकार ने परस्पर विरुद्ध दोनों मान्यताओं को 'असद्वाद' कहा है । द्रव्यार्थिक नय की मान्यता से सामान्य ही वास्तविक है तथा पर्यायार्थिक नय की मात्यता से केवल विशेष ही वास्तविक है। परन्तु इन दोनों के सापेक्ष होने पर एक-दूसरे का अस्तित्व सम्भावित हो जाता है । अतएव जब सामान्य धर्म की विवेचना की जाती है तो विशेष धर्म अविवक्षित होने से गौण हो जाता है । इसी प्रकार जब विशेष धर्म की प्ररूपणा होती है तो सामान्य धर्म गौण हो जाता है । इनमें जो परस्पर मुख्य, गौण दृष्टि अन्वित रहती है, वही अनेकान्त की आधार-शिला है। इस प्रकार इन दोनों नय के सापेक्ष होने पर अनेकान्तवाद का जन्म होता है । यदि वादी पहले से ही अनेकान्त-दृष्टि को रख कर हेतु पूर्वक साध्य का उपन्यास करता है, तो प्रतिवादी में ऐसी शक्ति नहीं है जो उसे पराजित कर सके । दूसरे शब्दों में प्रयोग-काल में साध्य के अविनाभावी हेतु के प्रयोग से साध्य को सिद्धि करने वाले वादी को कोई जीत नहीं सकता है। क्योंकि उसके वचन अनेकान्त रूपी कवच से ही सुरक्षित होते हैं। फिर, साध्य वादी को ही इष्ट होता है, प्रतिवादी को नहीं । वादी अपने अभिलषित साध्य को सिद्धि हेतु जिस साधन का प्रयोग करता है, उसका अपने साध्य के साथ अविनाभाव सम्बन्ध है या नहीं - यह प्रकट करने लिए वह साधर्म्य या वैधर्म्य दृष्टान्त का प्रयोग करें या न करे; किन्तु यदि उसका पक्ष अनेकान्त सिद्धान्त की मान्यता के अनुरूप है तो किसी भी अवस्था में उसका खण्डन नहीं हो सकता । एकान्त मान्यता वाला पक्ष तो पूर्ण रूप से कभी निर्दोष सिद्ध नहीं ही सकता। इससे यह स्पष्ट है कि एकान्त मान्यता ही आक्षेप का विषय है। क्योंकि एकान्तवादी परस्पर विरोधी होने के कारण एक-दूसरे को नहीं मानते, जिससे विरोध तथा विग्रह उत्पन्न होता है । किंतु अनेकान्त की मान्यता से परस्पर सौहार्द एवं सौमनस्य होता है तथा समन्वय की भूमिका का निर्माण होता है । |