+ अनेकान्ती ही भावस्पर्शी -
पाडेक्कनयपहगयं सुत्तं सुत्तहरसद्दसंतुट्ठा ।
अविकोवियसामत्था जहागमविभत्तपडिवत्ती ॥61॥
सम्मद्दंसणमिणमो सयलसमत्तवयणिज्जणिद्दोसं ।
अत्तुक्कोसविणट्ठा सलाहमाणा विणासेंति ॥62॥
अन्वयार्थ : [पाडेक्कणयपहगयं] प्रत्येक नय मार्गगत [सुत्त] सूत्र अथवा [सुत्तहरसद्दसंतुट्ठा] सूत्रधर के शब्द से सन्तुष्ट हो जाते हैं [अविकोवियसामत्था] निश्चय से विद्वता‌ के सामर्थ्य को [जहागमविभत्तपडिवत्ती] आगम से भिन्न प्राप्त करते हैं ।
[सलाहमाणा] (अपनी) प्रशंसा के पुल बाँधने वाले [अत्तुक्कोसविणट्ठा] आत्मोत्कर्ष (से) नष्ट (हो कर) [सयलसमत्तवयणिज्जणिद्दोसं] सम्पूर्ण सिद्ध निर्दोष वक्तव्य वाले [सम्मद्दंसणमिणमो] इस सम्यग्दर्शन को [विणासेंति] नष्ट कर देते हैं ।
Meaning : Those, who are satisfied by being called Satradhara (well-versed in Sutras) because they recite: Sutras which depend only on one Naya, remain devoid of capability indispensable to learned people. Their knowledge touches only words.
These boasters destroy Versatility, of view-points which takes a wholesale review and at the same time impede their spiritual progress.

  विशेष 

विशेष :

जो किसी एक नय से सूत्र को पढ़ कर यह समझता है कि 'सकल संसार क्षणिक है', 'तत्त्व ग्राह्म-ग्राहक भाव से शून्य है', 'वह सब विज्ञान मात्र है' इत्यादि सूत्रों से यह धारणा बना लेता है कि मैं सूत्रधर हो गया हूँ, सूत्रों का जानकार हूँ; वह शब्द मात्र से सन्तुष्ट हो जाता है । उसमें शब्दार्थ की विद्धत्ता का अभिमान जाग उठता है। वास्तव में तो वह आगम से भिन्न अर्थ को समझ रहा है । क्‍योंकि शब्द मात्र को पढ़ लेने से कोई विद्वान्‌ नहीं बन जाता । यथार्थ में सूत्र रटने वाले तत्त्व को जितना समझते है; तत्त्व उत्तना नहीं है । आगम के अनुसार वही ज्ञान भ्राप्त कर सकता है, विद्वान बन सकता है जो तत्त्वज्ञ हो, वस्तु का तनसस्‍पर्शी ज्ञान वाला हो तथा अनेकान्त सिद्धान्त से वस्तु-तत्त्व का भाव स्पर्श करने वाला हो ।

जो व्यक्ति एकान्त से समझ कर यह धारणा बना लेते हैं कि जो कुछ हम जानते हैं, वही पूर्ण है, निर्दोष है और वही वस्तु का वास्तविक स्वरूप है; इससे अधिक कुछ नहीं है -- वे अपने बुद्धि-वैभव को संकुचित कर कूपमण्डूक जैसे अपनी प्रशंसा के पुल बाँधा करते हैं तथा बुद्धि-विलास मात्र से ही सस्तुष्ट हो जाते हैं । वे सभी मतों में समान रूप से आस्थावान होते हैं । क्‍योंकि वे आत्म-प्रशंसा के अभिलाषी होते हैं। इससे उनका आत्मोत्कर्ष अवरुद्ध हो जाता है और वे अनेकान्त रूप सम्यग्दर्शन को नष्ट कर देते हैं ।