
विशेष :
जो किसी एक नय से सूत्र को पढ़ कर यह समझता है कि 'सकल संसार क्षणिक है', 'तत्त्व ग्राह्म-ग्राहक भाव से शून्य है', 'वह सब विज्ञान मात्र है' इत्यादि सूत्रों से यह धारणा बना लेता है कि मैं सूत्रधर हो गया हूँ, सूत्रों का जानकार हूँ; वह शब्द मात्र से सन्तुष्ट हो जाता है । उसमें शब्दार्थ की विद्धत्ता का अभिमान जाग उठता है। वास्तव में तो वह आगम से भिन्न अर्थ को समझ रहा है । क्योंकि शब्द मात्र को पढ़ लेने से कोई विद्वान् नहीं बन जाता । यथार्थ में सूत्र रटने वाले तत्त्व को जितना समझते है; तत्त्व उत्तना नहीं है । आगम के अनुसार वही ज्ञान भ्राप्त कर सकता है, विद्वान बन सकता है जो तत्त्वज्ञ हो, वस्तु का तनसस्पर्शी ज्ञान वाला हो तथा अनेकान्त सिद्धान्त से वस्तु-तत्त्व का भाव स्पर्श करने वाला हो । जो व्यक्ति एकान्त से समझ कर यह धारणा बना लेते हैं कि जो कुछ हम जानते हैं, वही पूर्ण है, निर्दोष है और वही वस्तु का वास्तविक स्वरूप है; इससे अधिक कुछ नहीं है -- वे अपने बुद्धि-वैभव को संकुचित कर कूपमण्डूक जैसे अपनी प्रशंसा के पुल बाँधा करते हैं तथा बुद्धि-विलास मात्र से ही सस्तुष्ट हो जाते हैं । वे सभी मतों में समान रूप से आस्थावान होते हैं । क्योंकि वे आत्म-प्रशंसा के अभिलाषी होते हैं। इससे उनका आत्मोत्कर्ष अवरुद्ध हो जाता है और वे अनेकान्त रूप सम्यग्दर्शन को नष्ट कर देते हैं । |