+ भक्ति या जानकारी मात्र से ज्ञानी नहीं -
ण हु सासणभत्तीमत्तएण सिद्धंतजाणओ होइ ।
ण वि जाणओ वि णियमा पण्णवणाणिच्छिओ णामं ॥63॥
अन्वयार्थ : [सासणभत्तीमेत्तएण] शासन-भक्ति मात्र से (कोई व्यक्ति) [सिद्धतंजाणओ] सिद्धान्त का ज्ञाता [ण हु] नहीं ही [होइ] होता; [जाणओ वि] जानकार (होने पर) भी [णियमा] नियम से [पण्णवणाणिच्छिओ] प्ररूपणा के योग्य निश्चित [णामं] नाम वाला [ण वि] नहीं ही होता है ।
Meaning : No one can come to possess the real knowledge of Siddhanta by mere devotion of the Canon. And also its knower as a rule is not entitled to make an exposition of the Sastras.

  विशेष 

विशेष :

जिन-शासन में भक्ति रखने वाला भक्त जिन-सिद्धान्त का ज्ञाता नही हो जाता । और सिद्धान्त का (शब्दार्थ) ज्ञाता भी निश्चित रूप से तत्त्वों की प्ररूपणा करने में समर्थ नहीं होता । वास्तव में तत्त्वों की प्ररूपणा वही कर सकता है, जिसे तत्त्व-ज्ञान हो, आत्म-ज्ञान हो। पूर्ण निश्चित तत्त्वज्ञान तथा आत्मानुभव के बिना तथाकथित तत्त्वज्ञानी भी तत्त्वों की यथावत्‌ विवेचना से हीन देखे जाते है । यथार्थ में तत्त्वज्ञान की विवेचना अनेकान्त-दृष्टि से ही सम्भव है। अतः तत्त्वज्ञान के बिना केवल सिद्धान्त का ज्ञाता पारंगत न होने से प्ररूपणा करने में असमर्थ रहता है ।