विशेष :
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उपयोग की अपेक्षा गुणस्थानों में मोहनीय के उदय संबंधी पदवृंद भंग |
| उपयोग |
मोहनीय स्व-स्व उदय-स्थानगत भंग |
पदवृंद |
गुणा |
कुल पदवृंद भंग |
| सूक्ष्मसाम्पराय |
7 |
1 |
7 * 1 |
1 |
7 |
| अनिवृत्तिकरण |
सवेद |
7 |
1 (2) |
7 * 2 |
12 |
168 |
| अवेद |
7 |
1 (1) |
7 * 1 |
4 |
28 |
| अपूर्वकरण |
7 |
20 (6,5,5,4) |
20 * 7 |
24 |
3660 |
| अप्रमत्त संयत |
सम्यक्त्व सहित |
7 |
24 (7,6,6,5) |
44 * 7 |
24 |
7392 |
| सम्यक्त्व रहित |
20 (6,5,5,4) |
| प्रमत्त संयत |
सम्यक्त्व सहित |
7 |
24 (7,6,6,5) |
44 * 7 |
24 |
7392 |
| सम्यक्त्व रहित |
20 (6,5,5,4) |
| देशविरत |
सम्यक्त्व सहित |
6 |
28 (8,7,7,6) |
52 * 6 |
24 |
7488 |
| सम्यक्त्व रहित |
24 (7,6,6,5) |
| असंयत सम्यक्त्व |
सम्यक्त्व सहित |
6 |
32 (9,8,8,7) |
60 * 6 |
24 |
8640 |
| सम्यक्त्व रहित |
28 (8,7,7,6) |
| वेक्रियिक-मिश्र और कार्मण काय योग में स्त्री वेद का उदय नहीं |
| औदारिक मिश्र योग मे एक पुरुष वेद ही संभव |
| मिश्र |
6 |
32 (9,8,8,7) |
32 * 6 |
24 |
4608 |
| सासादन |
5 |
32 (9,8,8,7) |
32 * 5 |
24 |
3840 |
| मिथ्यादृष्टि |
अनं. सहित |
5 |
36 (10,9,9,8) |
68 * 5 |
24 |
8160 |
| अनं. रहित |
32 (9,8,8,7) |
| पर्याप्त अवस्था में अनंतानुबंधी सहित मोहनीय के उदय स्थान = 10 (1 मिथ्यात्व + 4 कषाय + 2 हास्य-रति/शोक-अरति + 1 वेद + भय + जुगुप्सा), 9 (भय/जुगुप्सा में से कोई एक), 8 (भय/जुगुप्सा रहित) |
| अपर्याप्त अवस्था में अनंतानुबंधी का उदय अवश्य है |
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सर्व पदवृंद भंग |
51,083 |
| पंचसंग्रह -- सप्ततिका अधिकार गाथा 361 से 371 |
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