+ कवि व्यवस्था -
((छन्द छप्पा))
हौं निहचै तिहुंकाल, सुद्धचेतनमय मूरति ।
पर परनति संजोग, भई जड़ता विसफूरति ॥
मोहकर्म पर हेतु पाइ, चेतन पर रच्चइ ।
ज्यौं धतूर-रस पान करत, नर बहुविध नच्चइ ॥
अब समयसार वरनन करत, परम सुद्धता होहु मुझ ।
अनयास बनारसिदास कहि, मिटहु सहज भ्रम की अरुझ ॥४॥