+ शास्त्र का माहात्म्य -
((सवैया इकतीसा))
निहचै मैं रूप एक विवहार मैं अनेक,
याही नै विरोध मैं जगत भरमायौ है ।
जग के विवाद नासिबेकौ जिन आगम है,
जामैं स्याद्वादनाम लच्छन सुहायौ है ॥
दरसनमोह जाकौ गयौ है सहजरूप,
आगम प्रमान ताके हिरदै में आयौ है ।
अनैसौं अखंडित अनूतन अनंत तेज,
ऐसो पद पूरन तुरंत तिनि पायौ है ॥५॥