
शुद्धनय निहचै अकेलौ आपु चिदानंद,
अपनैंही गुन परजायकौं गहतु है ।
पूरन विज्ञानघन सो है विवहारमाहिं,
नव तत्त्वरुपी पंच दर्वमैं रहतु है ॥
पंच दर्व नव तत्त्व न्यारे जीव न्यारो लखै,
सम्यकदरस यहै और न गहतु है ।
सम्यकदरस जोई आतम सरूप सोई,
मेरे घट प्रगटोबनारसी कहतु है ॥7॥