
जैसैं तृण काठ वांस आरने इत्यादि और,
ईंधन अनेक विधि पावकमैं दहिये ।
आकृति विलोकित कहावै आग नानारूप,
दीसै एक दाहक सुभाव जब गहिये ॥
तैसैं नव तत्वमें भयौ हैं बहु भेषी जीव,
सुद्धरूप मिश्रित असुद्ध रूप कहिये ।
जाही छिन चेतना सकतिकौ विचार कीजै,
ताहीं छिन अलखअभेदरूप लहिये ॥८॥