
जैसैं रति-मंडलकै उदै महि-मंडल मैं,
आतप अटल तम पटल विलातु है ॥
तैसैं परमातमाकौ अनुभौ रहत जौलौं,
तौलौं कहूँ दुविधा न कहूँ पच्छपातु है ॥
नयकौ न लेस परवानकौ न परवेस,
निच्छेपके वंसकौ विधुंस होत जातु है ॥
जे जे वस्तु साधक हैं तेऊ तहां बाधक हैं,
बाकी राग दोषकी दसाकी कौन बातुहै ॥१०॥