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शुद्धनय से जीव का स्वरूप
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(अडिल्ल)
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आदि अंत पूरन-सुभाव-संयुक्त है ।
पर-सरूप-परजोग-कल्पनामुक्त है ॥
सदा एकरस प्रगट कही है जैन मैं ।
सुद्धनयातम वस्तु विराजै बेन मैं ॥११॥