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हितोपदेश
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(कवित्त -- ३१ मात्रा)
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सदगुरु कहै भव्यजीवनि सौं,
तोरहु तुरित मोह की जेल ।
समकितरूप गहौ अपनौं गुन,
करहु सुद्ध अनुभव कौ खेल ॥
पुदगलपिंड भाव रागादिक,
इनसौं नहीं तुम्हारौ मेल ।
ए जड़ प्रगट गुपत तुम चेतन,
जैसैं भिन्न तोय अरु तेल ॥१२॥