+ सम्यग्दृष्टि का विलास -
सम्यग्द्रष्टिना विलासनुं वर्णन
((सवैया इकतीसा))
कोऊ बुद्धिवंत नर निरखै सरीर-घर,
भेदज्ञानदृष्टिसौं विचारै वस्तु-वासतौ ।
अतीत अनागत वरतमान मोहरस,
भीग्यौ चिदानंद लखै बंधमैं विलासतौ ॥
बंधकौ विदारि महा मोहकौ सुभाउ डारि,
आतमाकौ ध्यान करै देखै परगासतौ ।
करम-कलंक-पंकरहित प्रगटरूप,
अचल अबाधित विलोकै देव सासतौ ॥१३॥