
अपनैंही गुन परजायसौं प्रवाहरूप,
परिनयौ तिहुं काल अपनै अधारसौं ।
अन्तर-बाहर-परकासवान एकरस,
खिन्नता न गहै भिन्न रहै भौ-विकारसौं ॥
चेतनाके रस सरवंग भरि रह्यौ जीव,
जैसे लौंन-कांकर भरयो है रस खारसौं ।
पूरन-सुरूप अति उज्जल विज्ञानघन,
मोकौं होहु प्रगट विसेस निरवारसौं ॥१५॥