+ भेदज्ञान की महिमा -
((सवैया इकतीसा))
याही वर्तमानसमै भव्यनिकौ मिटौ मौह,
लग्यौ है अनादिकौ पग्यौ है कर्ममलसौं ।
उदै करै भेदज्ञान महा रुचिकौ निधान,
उरकौ उजारौ भारौ न्यारौ दुंद-दलसौं ॥

जातैं थिर रहै अनुभौ विलास गहै फिरि,
कबहूं अपनपौ न कहै पुदगलसौं ।
यहै करतूति यौं जुदाई करैं जगतसौं,
पावक ज्यौं भिन्न करै कंचन उपलसौं ॥२३॥