
बानारसी कहै भैया भव्य सुनो मेरी सीख,
कैहूं भांति कैसैंहूंके ऐसौ काजु कीजिए।
एकहू मुहूरत मिथ्यातकौ विधुंस होइ,
ज्ञानकौं जगाइ अंस हंस खोजि लीजिए।
वाहिकौ विचार वाकौ ध्यान यहै कौतूहल,
यौंही भरि जनम परम रस पीजिए ।
तजि भव-वासकौ विलास सविकाररूप,
अंतकरि मौहकौ अनंतकाल जीजिए ॥२४॥