
जाके देह-द्युतिसौं दसौं दिसा पवित्र भई,
जाके तेज आगैं सब तेजवंत रुके हैं ।
जाकौ रुप निरखि थकित महा रूपवंत,
जाकी वपु-वाससौं सुवास और लुके हैं ॥
जाकी दिव्यधुनि सुनि श्रवणकौं सुख होत,
जाके तन लच्छन अनेक आइ ढुके हैं ।
तेई जिनराज जाके कहे विवहार गुन,
निहचै निरखि सुद्ध चेतनसौं चुके हैं ॥२५॥