
जामैं बालपनौ तरुनापौ वृद्धपनौ नाहिं,
आयु-परजंत महारूप महाबल है ।
बिना ही जतन जाके तनमैं अनेक गुन,
अतिसै-विराजमान काया निर्मल है ॥
जैसैं बिनु पवन समुद्र अविचलरूप,
तैसैं जाकौं मन अरु आसन अचल है ।
ऐसौ जिनराज जयवंत होउ जगतमैं,
जाकी सुभगति महा सुकृतकौ फल है ॥२६॥