
ऊंचे ऊंचे गढ़के कंगूरे यौं विराजत हैं,
मानौं नभलोक गीलिवेकौं दांत दीयौ है ।
सोहै चहूँओर उपवनकी सघनताई,
घेरा करि मानौ भूमिलोक घेरि लीयौ है ॥
गहिरी गंभीर खाई ताकी उपमा बनाई,
नीचौ करि आनन पताल जल पीयौ है ।
ऐसो है नगर यामैं नृपकौ न अंग कोऊ,
यौंही चिदानंदसौं सरीर भिन्न कीयौ है ॥२८॥