
जामैं लोकालोकके सुभाव प्रतिभासे सब,
जगी ज्ञान सकति विमल जैसी आरसी ।
दर्सन उद्योत लोयौ अंतराय अंत कीयौ,
गयौ महा मोह भयौ परम महारसी ॥
संन्यासी सहज जोगी जोगसौं उदासी जामैं,
प्रकृति पचासी लगि रही जरि छारसी ।
सोहै घट मंदिरमैं चेतन प्रगटरूप,
ऐसौ जिनराज ताहि बंदत बनारसी ॥२९॥