+ वस्तुस्वरूप की प्राप्ति का दृष्टांत -
((सवैया इकतीसा))
ज्यौं चिरकाल गड़ी वसुधामहि, भूरि महानिधि अंतर गूझी ।
कोउ उखारि धरै महि ऊपरि, जे द्रगवंत तिन्हैं सब सूझी ॥
त्यौं यह आतमकी अनुभूति; पडी जड़भाउ अनादि अरुझी ।
नै जुगतागम साधि कही गुरु, लच्छन-वेदि विचच्छन बूझी ॥३१॥