+ भेदविज्ञान की प्राप्ति का दृष्टांत -
((सवैया इकतीसा))
जैसैं कोऊ जन गयौ धोबीके सदन तिन,
पर्हियौ परायौ वस्त्र मेरौ मानि रह्यौ है ।
धनी देखि कह्यौ भैया यह तौ हमारौ वस्त्र,
चीन्हैं पहिचानत ही त्यागभाव लह्यौ है ॥
तैसैंही अनादि पुदगलसौं संजोगी जीव,
संग के ममत्वसौं विभाव तामैं बह्यौ है ।
भेदज्ञान भयौ जब आपौ पर जान्यौ तब
न्यारौ परभावसौं स्वभाव निजगह्यौ है ॥३२॥