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निजात्मा का सत्य स्वरूप
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(अडिल्ल छंद)
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कहै विचच्छन पुरुष सदा मैं एक हौं ।
अपने रससौं र्भयौ आपनी टेक हौं ॥
मोहकर्म मम नांहि नांहि भ्रमकूप है ।
सुद्ध चेतना सिंधु हमारौ रूप है ॥३३॥