
तत्त्वकी प्रतीतिसौं लख्यौ है निजपरगुन,
द्रग ज्ञानचरन त्रिविधि परिनयौ है।
विसद विवेक आयौ आछौ विसराम पायौ,
आपुहीमैं आपनौ सहारौ सोधि लयौ है ॥
कहत बनारसी गहत पुरुषारथकौं,
सहज सुभावसौं विभाव मिटि गयौ है ।
पन्नाके पकायें जैसैं कंचन विमल होत,
तैसैं सुद्ध चेतन प्रकाशरूप भयो है ॥३४॥