
जैसैं कोऊ पातुर बनाय वस्त्र आभरन,
आवति अखारे निसि आडौ पट करिकैं ।
दुहूँओर दीवटि संवारि पट दूरि कीजै,
सकल सभाके लोग देखैंद्रष्टि धरिकैं ॥
तैसैं ज्ञान सागर मिथ्याति ग्रंथि भेदि करि,
उमग्यौ प्रगट रह्यौ तिहूँ लोक भरिकैं ।
ऐसौ उपदेस सुनि चाहिए जगत जीव,
सुद्धता संभारै जग जालसौं निसरिकैं ॥३५॥