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अजीव अधिकार के वर्णन की प्रतिज्ञा
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(दोहरा)
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जीव तत्त्व अधिकार यह, कह्यौ प्रगट समुझाय ।
अब अधिकार अजीवकौ, सुनहु चतुर चित लाय ॥१॥