+ ज्ञानी कर्ता नहीं, मात्र ज्ञाता -
((सवैया इकतीसा))
जगमैं अनादिकौ अग्यानी कहै मेरौ कर्म,
करता मैं याकौ किरियाकौ प्रतिपाखी है ।
अंतर सुमति भासी जोगसौं भयौ उदासी,
ममता मिटाइ परजाइ बुद्धि नाखी है ॥
निरभै सुभाव लीनौ अनुभौके रस भीनौ,
कीनौ विवहारदृष्टि निहचैमैं राखी है ।
भरमकी डोरी तोरी धरमकौ भयौ धोरी,
परमसौं प्रीति जोरी करमकौ साखी है ॥४॥