((सवैया इकतीसा))
जैसो जो दरव ताके तैसो गुन परजाय,
ताहीसौं मिलत पै मिलै न काहु आनसौं ।
जीव वस्तु चेतन करम जड़ जातिभेद,
अमिल मिलाप ज्यौं नितंब जुरै कानसौं ॥
ऐसौ सुविवेक जाकै हिरदै प्रगट भयौ,
ताकौ भ्रम गयौ ज्यौं तिमिर भागै भानसौं ।
सोई जीव करमकौ करता सौ दीसै पै,
अकरता कह्यौ है सुद्धताके परमानसौं ॥5॥