((सवैया इकतीसा))
महा धीठ दुखकौ वसीठ परदर्वरूप,
अंधकूप काहूपै निवार्यो नहि गयौ है ।
ऐसौ मिथ्याभाव लग्यौ जीवकौं अनादिहीको,
याही अहंबुद्धि लिए नानाभांति भयौ है ॥
काहू समै काहूको मिथ्यात अंधकार भेदि,
ममता उछेदि सुद्ध भाव परिनयौ है ।
तिनही विवेक धारि बंधकौ विलास डारि,
आतम सकतिसौं जगत जीत लयौ है ॥११॥