((सवैया इकतीसा))
सुद्धभाव चेतन असुद्धभाव चेतन,
दुहूंकौ करतार जीव और नहि मानिये ।
कर्मपिंडकौ विलास वन रस गंध फास,
करता दुहूँकौ पुदगल पखानिये ॥
तातै वरनादि गुन ग्यानावरनादि कर्म,
नाना परकार पुदगलरूप जानिये ।
समल विमल परिनाम जे जे चेतनके,
ते ते सब अलख पुरुष यौं बखानिये ॥१२॥