
जैसैं गजराज नाज घासके गरास करि,
भच्छत सुभाय नहि भिन्न रस लीयौ है ।
जैसैं मतवारौ नहि जानै सिखरनि स्वाद,
जुंगमें मगन कहै गऊ दूध पीयौ है ॥
तैसैं मिथ्यादृष्टि जीव ज्ञानरूपी है सदीव,
पग्यौ पाप पुन्नसौं सहज सुन्न हीयौ है ।
चेतन अचेतन दुहूँकौ मिश्र पिंड लखि,
एकमेक मानै न विवेक कछु कीयौ है ॥१३॥