
जैसैं महा धूपकी तपतिमैं तिसायौ मृग,
भरमसौं मिथ्याजल पीवनकौं धायौ है ।
जैसैं अंधकार मांहि जेवरी निरखि नर,
भरमसौं डरपि सरप मानि आयौ है ॥
अपनैं सुभाव जैसे सागर सुथिर सदा,
पवन-संजोगसौं उछरि अकुलायौ है ।
तैसैं जीव जड़सौ अव्यापक सहज रूप,
भरमसौ करमकौ करता कहायौ है ॥१४॥