((अड़िल्ल छंद))
ज्ञानवंतकौ भोग निरजरा-हेतु है।
अज्ञानीकौ भोग बंध फल देतु है ॥
यह अचरजकी बात हिये नहि आवही ।
पूछे कोऊ सिष्य गुरू समझावही ॥२२॥