((छप्पय))
ज्यौं माटीमैं कलस होनकी, सकति रहै ध्रुव ।
दंड चक्र चीवर कुलाल, बाहजि निमित्त हुव ॥
त्यौं पुदगल परवांनु, पुंज वरगना भेस धरि ।
ज्ञानावरनादिक स्वरूप, विचरंत विविध परि ॥
बाहजि निमित्त बहिरातमा, गही संसै अज्ञानमति ।
जगमांहि अहंकृत भावसौं, करमरूप है परिनमति ॥२४॥