(
(सवैया तेवीसा)
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जे न करै नयपच्छ विवाद, धरै न विखाद अलीक न भाखैं ।
जे उदवेग तजैं घट अंतर, सीतल भाव निरंतर राखैं ॥
जे न गुनी-गुन-भेद विचारत, आकुलता मनकी सब नाखैं ।
ते जगमैं धरि आतम ध्यान, अखंडित ज्ञान-सुधारस चाखैं ॥25॥