((सवैया इकतीसा))
विवहार-दृष्टिसौं विलोकत बंध्यौसौ दीसै,
निहचै निहारत न बांध्यौ यह किनिहीं ।
एक पच्छ बंध्यौ एक पच्छसौं अबंध सदा,
दोऊ पच्छ अपनैं अनादि धरे इनिहीं ॥
कोऊ कहै समल विमलरूप कोऊ कहै,
चिदानंद तैसौई बखान्यौ जैसौ जिनिहीं ।
बंध्यौ मानै खुल्यौ मानै दोऊ नैको भेद जानै,
सोई ज्ञानवंत जीव तत्त्व पायौ तिनिहीं ॥26॥