
प्रथम नियत नय दूजी विवहार नय,
दुहूकौं फलावत अनंत भेद फले हैं ।
ज्यौं ज्यौं नय फलैं त्यौं त्यौं मनके कल्लोल फलैं,
चंचल सुभाव लोकालोकलौं उछले हैं ॥
ऐसी नयकक्ष ताकौ पक्ष तजि ज्ञानी जीव,
समरसी भए एकतासौं नहि टले हैं ।
महामोह नासि सुद्ध-अनुभौ अभ्यासि निज,
बल परगासि सुखरासि मांहि रले हैं ॥27॥